मिस्से पुण्णालाओ, अणुद्दिसाणुत्तरा हु ते सम्मा।
अविरद तिण्णालावा, अणुद्दिसाणुत्तरे होंति॥718॥
अन्वयार्थ : नव ग्रैवेयक पर्यन्त सामान्य से समस्त देवों के मिश्र गुणस्थानों में एक पर्याप्‍त ही आलाप होता है। इसके ऊपर अनुदिश और अनुत्तर विमानवासी सब देव सम्यग्दृष्टि ही होते हैं, अत: इन देवों के अविरत गुणस्थान में तीन आलाप होते हैं ॥718॥

  जीवतत्त्वप्रदीपिका