
सुहपयडीण विसोही तिव्वो असुहाण संकिलेसेण ।
विवरीदेण जहण्णो अणुभागो सव्वपयडीणं ॥163॥
बादालं तु पसत्था विसोहिगुणमुक्कडस्स तिव्वाओ ।
बासीदि अप्पसत्था मिच्छुक्कडसंकिलिट्ठस्स ॥164॥
अन्वयार्थ : शुभ प्रकृतियों का अनुभागबंध विशुद्ध परिणामों से तीव्र होता है । अशुभ प्रकृतियों का अनुभागबंध संक्लेश परिणामों से तीव्र होता है । विपरीत परिणामों से जघन्य अनुभागबंध होता है । इस प्रकार सब प्रकृतियों का अनुभागबंध जानना ।
42 प्रशस्त प्रकृतियाँ हैं उनका तीव्र अनुभागबंध विशुद्धतारूप गुण की उत्कृष्टता वाले जीव के होता है । 82 अप्रशस्त प्रकृतियाँ उत्कृष्ट संक्लेश परिणाम वाले मिथ्यादृष्टि जीव के तीव्र अनुभाग सहित बंधती हैं ।