
घादीणं अजहण्णोऽणुक्कस्सो वेयणीयणामाणं ।
अजहण्णमणुक्कस्सो गोदे चदुधा दुधा सेसा ॥178॥
अन्वयार्थ : चारों घातिया कर्मों का अजघन्य अनुभागबंध, वेदनीय और नामकर्म का अनुत्कृष्ट अनुभागबंध, और गोत्रकर्म का अजघन्य तथा अनुकृष्ट अनुभागबंध - इन सबका सादि, अनादि, ध्रुव,अध्रुव के भेद से चार प्रकार का बंध हैं और शेष के सादि और अध्रुव दो ही प्रकार हैं ॥178॥