
मिस्सदुकम्मइयच्छिदी साणे संढे ण होइ पुरसिच्छी ।
हारदुगं विदियगुणे ओरालियमिस्स वोच्छेदो ॥४४॥
मिश्रद्विककार्मणच्छित्ति: सासादने, षंढे न भवत: पुरुषस्त्रियौ ।
आहारद्विकं द्वितीयगुणे औदारिकमिश्रस्य व्युच्छेद:॥
अन्वयार्थ : स्त्रीवेद के सासादन गुणस्थान में औदारिकमिश्र, वैक्रियकमिश्र और कार्मण की व्युच्छित्ति हो जाती है । नपुंसकवेद में पुरुषवेद, स्त्रीवेद, आहारकद्विक चार आस्रव न होने से ५३ होते है । नपुंसकवेद के द्वितीय गुणस्थान में औदारिकमिश्र की व्युच्छित्ति हो जाती है ॥४४॥