तेसिं अवणिय वेगुव्वियमिस्स अविरदे हु णिक्खेवे ।
कोहचउक्के माणादिबारसहीण पणदाला ॥४५॥
तेषां अपनीय वैक्रियिकमिश्रं अविरते हि निक्षिपेत् ।
क्रोधचतुष्के मानादिद्वादशहीना: पंचचत्वारिंशत् ॥४५॥
अन्वयार्थ : इस नपुंसकवेद के सासादन गुणस्थान में वैक्रियकमिश्र नहीं है परन्तु चतुर्थ गुणस्थान में वैक्रियक मिश्र होता है ॥४५॥
विशेष-यहाँ स्त्रीवेद, नपुंसकवेद नव गुणस्थानों में हैं यह भाववेद का कथन है ।