माणादितिये एवं इदरकसाएहिं विरहिदा जाणे ।
कुमदिकुसुदे ण विज्जदि हारदुगं होंति पणवण्णा ॥४६॥
मानादित्रिके एवं इतरकषायै: विरहितान् जानीहि ।
कुमतिकुश्रुतयो: न विद्यते आहारद्विकं भवन्ति पंचपंचाशत् ॥
अन्वयार्थ : मानादि तीनों कषायों में भी इसी प्रकार से इतर कषायों से रहित समझो ।
कुमति, कुश्रुत में आहारकद्विक न होने से ५५ आस्रव हैं ॥४६॥