वेभंगे वावण्णा कमणमिस्सदुगहारदुगहीणा ।
णाणतिये अडदालं पणमिच्छाचारिअणरहिदा ॥४७॥
विभंगे द्विपंचाशत् कार्मणमिश्रद्विकाहारद्विकहीना: ।
ज्ञानत्रिके अष्टचत्वारिंशत् पंचमिथ्यात्वचतुरनरहिता: ॥
अन्वयार्थ : विभंग अवधिज्ञान में आहारकद्विक, वैक्रियकमिश्र, औदारिकमिश्र और कार्मण, ये पाँच आस्रव न होने से ५२ होते हैं । मति, श्रुत, अवधिज्ञान में पाँच मिथ्यात्व और चार अनंतानुबंधी से रहित ४८ आस्रव होते हैं ॥४७॥