
किण्हदुसाणे वेगुव्वियमिस्सछिदी हवेइ तेउतिए ।
मिच्छदुठाणे ओरालियमिस्सो णत्थि अविरदे अत्थि ॥५६॥
कृष्णद्विकसासादने वैक्रियिकमिश्रच्छित्ति: भवेत् तेजस्त्रिके ।
मिथ्यात्वद्विस्थाने औदारिकमिश्रं नास्ति अविरतेऽस्ति ॥
अन्वयार्थ : कृष्ण, नील लेश्या में सासादन गुणस्थान में वैक्रियकमिश्र की व्युच्छित्ति होती है । पीत, पद्म, शुक्ल लेश्या में मिथ्यात्व, सासादन गुणस्थान में औदारिक मिश्र नहीं है और चौथे गुणस्थान में है ॥५६॥