+ भव्य मार्गणा -
सुहलेस्सतिये भव्वे सव्वेऽभव्वे ण होदि हारदुगं ।
पणवण्णुवसमसम्मे ते मिच्छोरालमिस्सअणरहिदा ॥५७॥
शुभलेश्यात्रिके भव्ये सर्वे अभव्ये न भवात्याहारद्विकं ।
पंचपंचाशदुपशमसम्यक्त्वे ते मिथ्यात्वौदारिकमिश्रानरहिता: ॥
अन्वयार्थ : शुभ तीन लेश्याओं में सभी भाव हैं । भव्य जीवों के सभी भाव होते हैं । अभव्य जीवों में आहारकद्विक रहित ५५ भाव होते हैं । इनमें पूर्वोक्त कोष्ठक रचना समझना ।