
एदे वेदगखइए हारदुओरालमिस्ससंजुत्ता ।
मिच्छे सासण मिस्से सगगुणठाणव्व णायव्वा ॥५८॥
एते वेदकक्षायिकयो: आहारद्विकौदारिकमिश्रसंयुक्ता: ।
मिथ्यात्वे सासादने मिश्रे स्वकगुणस्थानवज्ज्ञातव्या ॥
अन्वयार्थ : उपशम सम्यक्त्व में ५ मिथ्यात्व, औदारिकमिश्र, अनंतानुबंधीचतुष्क, आहारकद्विक इन १२ आस्रवों को घटा देने से ४५ आस्रव रहते हैं । गुणस्थान चौथे से ग्यारहवें तक होते हैं |
वेदक और क्षायिक सम्यक्त्व में उपर्युक्त ४५ में आहारकद्विक और औदारिक मिश्र मिलाकर ४८ आस्रव होते हैं । वेदक सम्यक्त्व चौथे से सातवें तक रहता है । मिथ्यात्व, सासादन एवं मिश्र में अपने-अपने गुणस्थान के
समान व्यवस्था समझना ॥५८॥
मिथ्यात्व, सासादन, मिश्र में गुणस्थानवत् रचना है । क्षायिक सम्यक्त्व में गुणस्थानवत् रचना है, चौथे से चौदह तक गुणस्थान पाये जाते हैं ।