
सण्णिस्स होंति सयला वेगुव्वाहारदुगमसण्णिस्स ।
चदुमणमादितिवयणं अणिंदियं णत्थि पणदाला ॥५९॥
संज्ञिन: भवन्ति सकला वैक्रियिकाहारद्विकमसंज्ञिन: ।
चतुर्मनांसि आदित्रिवचनानि अनिन्द्रियं न संति पंचचत्वारिंशत् ॥
अन्वयार्थ : संज्ञी जीवों में संपूर्ण आस्रव होते हैं । असंज्ञी जीवों में आहारकद्विक, वैक्रियकद्विक, चार मनोयोग, सत्यवचन योग, असत्यवचनयोग, उभयवचनयोग, मननिमित्तक अविरति ये १२ आस्रव नहीं होते हैं ॥५९॥
संज्ञी जीवों में गुणस्थान १२ होते हैं अत: गुणस्थानवत् रचना समझना ।
असैनी में दो गुणस्थान होते हैं ।