+ भावैकांत की मान्यता में दोष -
भावैकांते पदार्थाना-मभावानामपन्हवात्
सर्वात्मकमनाद्यन्त-मस्वरूपमतावकम् ॥9॥
अन्वयार्थ : हे भगवन् ! [पदार्थानां भावैकांते अभावानां अपह्नवात्] यदि पदार्थों के अस्तित्व का ही एकांत माना जाये, तब तो अभावों का लोप हो जाता है [अतावकं सर्वात्मकं अनाद्यनंतं अस्वरूपं] पुन: आपसे भिन्न अन्य सभी के यहाँ सभी वस्तु सर्वात्मक, अनादि, अनंत और स्वरूप शून्य हो जावेंगी ।

  ज्ञानमती 

ज्ञानमती :


सब पदार्थ एकांतरूप से, अस्तिरूप ही यदि जग में;;तो अभाव का लोप हुआ फिर, चार दोष है प्रमुख बने;;सब पदार्थ सबरूप, अनादि, अनिधन नि:स्वरूप होंगे;;हे भगवन् ! तव मत के द्वेषी, जन के यहाँ न कुछ होंगे
हे भगवन् ! यदि आप से भिन्न अन्य मतावलम्बियों के यहाँ सभी पदार्थ सर्वथा भावैकान्त--नित्यरूप ही माने जावेंगे, तब तो अभाव -- प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, इतरेतराभाव और अत्यन्ताभाव-रूप अभावों का नाश हो जाने से सभी पदार्थ सर्वात्मक, अनादि, अनन्त और अस्वरूप -- स्वरूप-रहित -- शून्यरूप हो जावेंगे ।

प्रत्येक वस्तु मैं जैसे भाव धर्म है वैसे ही अभाव धर्म भी है वह अभाव मुख्यतया चार भेद रूप है । यथा--प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अन्योन्याभाव और अत्यंताभाव । यहाँ कारिका के उत्तरार्ध में उन्हीं चार अभावों के न मानने से होने वाले दोषों के नाम बताये गए हैं । आगे ग्रंथकार स्वयं इस बात को प्रकट करेंगे ।