+ क्या ज्ञान ज्ञेय से सर्वथा भिन्न है -
सदात्मना च भिन्नं चेज्ज्ञानं ज्ञेयाद् द्विधाप्यसत्।
ज्ञानाऽभावे कथं ज्ञेयं बहिरन्तश्च ते द्विषाम् ॥30॥
अन्वयार्थ : [चेत् सदात्मना च ज्ञानं ज्ञेयात् भिन्नं द्विधा अपि असत्] यदि सत् रूप से भी ज्ञान ज्ञेय पदार्थों से भिन्न है, तब तो ज्ञान और ज्ञेय दोनों ही असत् हो जावेंगे [ते द्विषां ज्ञानाऽभावे बहिरंतश्च ज्ञेयं कथं] हे भगवन्! आपके विद्वेषी ए कांतवादियों के यहाँ ज्ञान के अभाव में बहिरंग और अंतरंगभूत ज्ञेय पदार्थ केसे सिद्ध हो सकेंगे।

  ज्ञानमती 

ज्ञानमती :


ज्ञान यदी निज ज्ञेय वस्तु से, सत्स्वरूप से भिन्न कहा;; तब तो ज्ञान-ज्ञेय दोनों का, भी अस्तित्व समाप्त हुआ;; प्रभो! ज्ञान के अभाव होने से बाह्याभ्यंतर सब ज्ञेय;;केसे होंगे सिद्ध! कहो फिर, तव मत विद्वेषी के मेय
यदि सत्रूप से भी ज्ञान ज्ञेय से भिन्न माना जाये, तब तो ज्ञान और ज्ञेय दोनों ही असत्रूप हो जायेंगे, क्योंकि हे भगवन्! आपके द्वेषी सर्वथैकांतवादियों के यहाँ ज्ञान के अभाव में बहिस्तत्त्वरूप तथा अन्तस्तत्त्वरूप ज्ञेय पदार्थों की सिद्धि भी केसे हो सकेगी ?