
ज्ञानमती :
बौद्धजनों के यहाँ वचन, सामान्य अर्थ को ही कहते;; है विशेष, वास्तविक स्वलक्षण, वचन उसे नहिं कह सकते;; बिन विशेष सामान्य कहाँ है, फिर सामान्य न होने से;; सारे वचन व्यर्थ अरु झूठे, ही होंगे उनके मत से
आप बौद्धों के यहाँ वचन सामान्य अर्थ को कहने वाले हैं, उन वचनों के द्वारा विशेष का कथन नहीं किया जा सकता है पुन: आपके यहाँ सामान्य का अभाव होने से सम्पूर्ण वचन असत्य-मिथ्या ही हैं।भावार्थ-प्रत्येक वस्तु के सामान्य-विशेष ऐसे दो धर्म रहते हैं। यदि वचनों से सामान्य का ही कथन होवे, तब विशेष का कथन न हो सकने से विशेष का अभाव हो जाने से सामान्य नहीं रह सकेगा और सभी वचन असत्य अर्थ को ही कहने वाले हो जावेंगे। |