+ अद्वैत पृथक्त्व एकान्त में दोष -
विरोधान्नोभयैकात्म्यं, स्याद्वादन्यायविद्विषाम् ।
अवाच्यतैकान्तेऽप्युक्तिर्नावाच्यमिति युज्यते ॥32॥
अन्वयार्थ : [स्याद्वादन्यायविद्विषां उभयैकात्म्यं न विरोधात्] स्याद्वाद न्याय के विद्वेषियों के यहाँ अद्वैत और द्वैत का एकात्म्य भी नहीं बन सकेगा, क्योंकि इन दोनों का परस्पर में विरोध पाया जाता है [आवाच्यतैकांते अपि अवाच्यं इति उक्ति: न युज्यते] एकांत से इन दोनों की अवाच्यता स्वीकार करने पर भी ‘अवाच्य’ यह वचन नहीं बोला जा सकता है। अर्थात् स्याद्वाद को न मानने से ये बाधाएं आती हैं।

  ज्ञानमती 

ज्ञानमती :


ये एकत्व पृथक्त्व उभय, आपस में नित्य विरोधी हैं;; स्याद्वाद विद्वेषी के ये, उभय तत्त्व निरपेक्ष रहें;; यदि दोनों हैं ‘अवाच्य’ द्वैताद्वैत कथन नहिं हो युगपत्;;तब निरपेक्ष अवाच्य यही वच, केसे होवेगा सुघटित?
स्याद्वाद न्याय से द्वेष रखने वाले एकांतवादियों के यहाँ उभयैकात्म्य भी सिद्ध नहीं हो सकता है क्योंकि पृथक्त्वैकांत एवं अपृथक्त्वैकांत इन दोनों का परस्पर में विरोध है। यदि आप कहें कि हम तत्त्व को एकांत से अवाच्य मानते हैं, तब तो ‘‘अवाच्य’’ यह कथन भी नहीं बन सकेगा।