+ अद्वैत और पृथक्त्व सच्चे भी हैं -
अनपेक्ष्ये पृथक्त्वैक्ये, ह्यवस्तु द्वय-हेतुत:
तदेवैक्यं पृथक्त्वं च, स्वभेदै: साधनं यथा ॥33॥
अन्वयार्थ : [अनपेक्ष्ये पृथक्त्वैक्ये हि अवस्तु द्वय हेतुत:] ये अद्वैत और पृथक्त्व एक-दूसरे की अपेक्षा न रखने से अवस्तु हैं क्योंकि दो हेतु पाये जाते हैं [तत् एव ऐक्यं पृथक्त्वं च यथा स्वभेदै: साधनं] उसी प्रकार अद्वैत और पृथक्त्व ये दोनों एक-दूसरे की अपेक्षा रखने से वस्तुभूत हैं जैसे कि हेतु अपने अन्वय व्यतिरेक भेदों से वास्तविक होता है

  ज्ञानमती 

ज्ञानमती :


यदि एकत्व पृथक्त्व परस्पर, में निरपेक्ष रहें तब तो;;हेतुद्वय से उभय न होंगे, वस्तुभूत किन्चित् भी तो;;यदि अपृथक् पृथक्त्वापेक्षी, पृथक्-अपृथक् अपेक्षी है;;तब तो वस्तुभूत अविरोधी, भेदापेक्षि हेतुवत् हैं
यदि पृथक्त्व और एकत्व ये दोनों धर्म परस्पर निरपेक्ष हैं तो वे अवस्तुरूप हैं किन्तु दो प्रकार के हेतुओं से परस्पर सापेक्ष से ही पृथक्त्व और एकत्व धर्म वस्तुभूत हैं, जैसे पक्षधर्मत्व आदि अपने भेदों से निरपेक्ष हेतु अवस्तुरूप है और वही हेतु अपने भेदों से सापेक्ष होकर वस्तुरूप है।

भावार्थ-जीवादि वस्तु कथंचित् अद्वैत रूप हैं क्योंकि सत् की अपेक्षा से सभी वस्तुओं में एकत्व का अनुभव आ रहा है। उसी प्रकार से वे ही जीवादि वस्तु कथंचित् पृथक्त्व रूप हैं क्योंकि द्रव्य पर्याय आदि की अपेक्षा सबका पृथक्पृथक् अनुभव आ रहा है। ये दो हेतु सभी वस्तु को उभयरूप सिद्ध कर रहे हैं।