+ अवस्तु ही अवक्तव्य है -
अवस्त्वनभिलाप्यं स्यात्सर्वान्तै: परिवर्जितम्
वस्त्वेवावस्तुतां याति, प्रक्रियाया विपर्ययात्॥48॥
अन्वयार्थ : [सर्वान्तै: परिवर्जितं अवस्तु अनभिलाप्यं स्यात्] जो सभी धर्मों से रहित है वही अवस्तु है और वही अवक्तव्य है [प्रक्रियाया विपर्ययात् वस्तु एव अवस्तुतां याति] क्योंकि प्रक्रिया के पलट देने से वस्तु ही अवस्तुपने को प्राप्त हो जाती है।

  ज्ञानमती 

ज्ञानमती :


सब धर्मों से रहित वस्तु में, सदा अवस्तू ही होंगी;;वे तो ‘अवक्तव्य’ कोटि में, वाच्य वचन से नहिं होंगी;;वस्तू ही प्रक्रिया पलटने, से अवस्तु बन जाती है;;परद्रव्यादि चतुष्टय से ही, वस्तु अवस्तु कहाती है
जो समस्त धर्मों से रहित है वह अवस्तु है और वही अवाच्यहै। क्योंकि प्रक्रिया के विपर्यय से-स्वरूपादि से विपरीत पररूपादि से वस्तु ही अवस्तु रूप हो जाती है।

भावार्थ-जब वस्तु में परद्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव चतुष्टय की अपेक्षा करते हैं, तभी वह वस्तु कथंचित् अवस्तु कहलाती है न कि सभी धर्मों से रहित अवस्तु।