+ सभी धर्मों से रहित को कहा नहीं जा सकता -
सर्वान्ताश्चेदवक्तव्यास्तेषां किम वचनं पुन:
संवृत्तिश्चेन्मृषैवेषा परमार्थ-विपर्ययात् ॥49॥
अन्वयार्थ : [चेत् सर्वांता अवक्तव्या: पुन: तेषां वचनं किम] यदि सभी धर्म अवक्तव्य हैं, तब तो उनका धर्म देशना आदि कथन भी कैसे होगा ? [संवृति: चेत् परमार्थविपर्ययात् एषा मृषा एव] यदि कहो कि अवक्तव्य का कथन संवृति रूप है, तब तो यह संवृति परमार्थ से विपरीत होने से असत्य ही है।

  ज्ञानमती 

ज्ञानमती :


यदि सब धर्म अवाच्य रहेंगे, पुन: कथन उनका कैसे?;;धर्मदेशना, स्वपर पक्ष, साधन दूषण वाणी कैसे?;;यदी वचन संवृतीरूप, फिर मिथ्या ही वे सिद्ध हुए।;;इन परमार्थ विरुद्ध वचन से, नहिं सत्यार्थ बोध होवे
यदि सभी धर्म अवक्तव्य ही हैं पुन: आपके यहाँ उनका कथन भी कैसे हो सकेगा ? और यदि आप कहें कि उनका कथन संवृति रूप है तब तो परमार्थ से विपरीत होने से यह संवृति तो असत्य ही है।