
ज्ञानमती :
हिंसा के अभिप्राय रहित, हिंसा करता कोई निश्चित;;हिन्सा के अभिप्राय सहित, नहिं हिंसा कर सकता किन्चित्;;इन दोनों से रहित बंधा है, बद्ध जीव नहीं छूटेगा;;क्षणिक निरन्वय नाश पक्ष में, अन्य जीव फल भोगेगा
हिंसा के अभिप्राय से सहित चित्त तो हिंसक नहीं होगा तथा अभिप्राय से रहित चित्त हिंसा करे एवं हिंसा के अभिप्राय से सहित और रहित से भिन्न तीसरा ही चित्त बंध को प्राप्त होगा तथा जो बंधा है, उससे भिन्न चौथा ही चित्त बंध से युक्त हो सकेगा अर्थात् आप बौद्धों के क्षणिकैकांत में यह व्यवस्था हो जायेगी।भावार्थ-बौद्ध के क्षणिक एकांत मत में जो हिंसा का अभिप्राय करता है, वह द्वितीय क्षण में समाप्त हो गया और दूसरा कोई आत्मा आ गया, जो हिंसा कर डालता है पुन: द्वितीय क्षण में वह समाप्त हो जाता है, तब तीसरा ही इस हिंसा के पाप से बंध जाता है और वह समाप्त हो जाता है, इत्यादि बाधाएँ आती हैं। |