+ नाश को निर्हेतुक मानने में दोष -
अहेतुकत्वान्नाशस्य, हिंसाहेतुर्न हिंसक:
चित्त-सन्तति-नाशश्च, मोक्षो नाष्टांग-हेतुक: ॥52॥
अन्वयार्थ : [नाशस्य अहेतुकत्वात् हिंसाहेतु: हिंसक: न] नाश को अहेतुक मानने से हिंसक हिंसा में हेतु नहीं हो सकता है [चित्तसंततिनाश: मोक्ष: च अष्टांगहेतुक: न] यदि चित्तसंतति के नाशरूप मोक्ष होता है, तब वह मोक्ष अष्टांग हेतुक नहीं बन सकता है।

  ज्ञानमती 

ज्ञानमती :


यदी नाश निर्हेतुक है, हिंसक हिंसा में हेतु नहीं;;तथा चित्तसंतति विनाश से, मोक्ष कहा निर्हेतु सही;;पुन: आप अष्टांग निमित्तक, मोक्ष कहा सो कैसे हो?;;यदी नाश निर्हेतुक है तब मोक्ष सहेतुक कैसे हो?
यदि आप बौद्ध नाश को अहेतुक मानते हैं तो हिंसा के हेतु को हिंसक नहीं मानना चाहिए और चित्तसंतति के निरोधरूप मोक्ष को भी अष्टांग हेतुक नहीं कहना चाहिए।

भावार्थ-बौद्धों ने नाश को निष्कारणक माना है और चित्त संतति के नाश को मोक्ष कहा है पुन: उस मोक्ष को सम्यक्त्व, संज्ञा, संज्ञी, वाक्कायकर्म, अंतव्र्यायाम, अजीव, स्मृति और समाधि इन आठ कारणों से होना बताया है। उधर नाश को अहेतुक कह दिया है पुन: चित्तसंतति के नाशरूप मोक्ष को अष्टांग हेतुक कह दिया, यह बात परस्पर विरुद्ध हो गई है।