+ बौद्ध ने हेतु को विसदृश कार्य के लिए माना है -
विरूपकार्यारम्भाय, यदि हेतुसमागम:
आश्रयिभ्यामनन्योऽसा-वविशेषादयुक्तवत् ॥53॥
अन्वयार्थ : [यदि विरूपकार्यारम्भाय हेतु समागम:] यदि विसदृश कार्य को उत्पन्न करने के लिए हेतु का समागम माना जावे [असौ आश्रयिभ्यां अनन्य: अविशेषात् अयुक्तवत्] तो यह हेतु नाश तथा उत्पाद दोनों का कारण होने स अपने इन दोनों आश्रयियों से भिन्न नहीं है, क्योंकि उन नाश, उत्पाद रूप दोनों आश्रयीभूतों में परस्पर में भेद नहीं है। जैसे अपृथक् सिद्ध पदार्थों का कारण अपने आश्रयियों से भिन्न नहीं होता है।

  ज्ञानमती 

ज्ञानमती :


कार्य विसदृश करने हेतू, हेतु समागम यदी कहो;;तब वह हेतू नाश और उत्पाद उभय में निमित अहो;;आश्रयभूत अत: हेतू, इन दोनों से अभिन्न रहता;;इक ही मुद्गर घट का नाश, कपाल उत्पाद उभय करता
यदि आप विसदृश कार्य को आरंभ करने के लिए हेतु का समागम स्वीकार करते हैं। तब तो यह हेतु का व्यापार अपने आश्रयी-नाश और उत्पाद से अभिन्न ही है क्योंकि उन दोनों में परस्पर में कोई भेद नहीं है। जैसेअयुक्त-अपृथक् सिद्ध पदार्थों का कारण अपने आश्रयियों से भिन्न नहीं होता है।।

भावार्थ-बौद्ध का यह कहना है कि नाश तो निर्हेतुक है किन्तु उससे जो कार्य होता है, वह सहेतुक है। जैसे किसी ने घड़े पर मुद्गर मारा तो घड़े का फूटना मुद्गर हेतुक नहीं है, किन्तु जो कपाल बन गये हैं वे मुद्गर हेतुक हैं क्योंकि वे विसदृश कार्य हैं किन्तु जैनाचार्यों का कहना है कि एक मुद्गर ही घड़े के फूटने में और कपाल के उत्पन्न होने में दोनों में हेतु है अत: एक ही हेतु नाश और उत्पाद दोनों को करता है, वह बात ही स्पष्ट सिद्ध है।