+ बौद्ध के यहाँ स्कंधादी में उत्पादादि नहीं बनते हैं -
स्कन्धा: सन्ततयश्चैव, संवृतित्वादसंस्कृता:
स्थित्युत्पत्तिव्ययास्तेषां, न स्यु: खर-विषाणवत् ॥54॥
अन्वयार्थ : [स्कन्धा: संततयश्चैव असंस्कृता: संवृतित्वात्] बौद्धों के यहाँ संततियाँ अकार्य रूप हैं क्योंकि वे संवृति रूप हैं [तेषां स्थित्युत्पत्तिव्यया: खरविषाणवत् न स्यु:] अत: उनमें उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य नहीं हो सकते हैं जैसे कि गधे के सींग में उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य का अभाव है।

  ज्ञानमती 

ज्ञानमती :


बौद्धों की स्कंध संततियाँ, कही गई हैं असंस्कृतरूप।;;क्योंकी वे संवृत्तिरूप हैं, नहिं परमार्थभूत सत्रूप;;रूप, वेदना, विज्ञान अरु संज्ञा, संस्कार पांच स्कंध;;व्यय, उत्पाद, ध्रौव्य उनमें नहिं, घट सकता जैसे खरशृंग
स्कन्धो की परम्परा असंस्कृत ही है। क्योंकि वह संवृत्ति रूप है, इसलिए खर विषाण के समान इन स्कन्धो में उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य भी नहीं हो सकता है।

भावार्थ-बौद्धों ने हमेशा ही प्रत्येक परमाणु-परमाणु को पृथक्-पृथक् आपस में स्पर्श रहित माना है अत: उसके यहाँ स्कंध परम्परा असत्य ही है पुन: वह कपाल आदि कार्यरूप कैसे हो सकेगी और जब स्कंध वास्तविक नहीं है,तब उनमें उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य व्यवस्था असंभव है। बौद्ध के यहाँ स्कंध के पाँच भेद हैं-रूप, वेदना, विज्ञान, संज्ञा, संस्कार। इनकी उत्पत्ति आदि कैसे बनेगी, क्योंकि ये कार्यभूत नहीं हैं।