+ नित्य क्षणिक का उभय एकांत सदोष है -
विरोधान्नोभयैकात्म्यं स्याद्वादन्यायविद्विषाम्
अवाच्यतैकान्तेऽप्युक्तिर्नावाच्यमिति युज्यते ॥55॥
अन्वयार्थ : [स्याद्वादन्यायविद्विषां उभयैकात्म्यं न विरोधात्] स्याद्वादन्याय के विद्वेषियों के यहाँ नित्य क्षणिक का उभय एकात्म्य भी असंभव है, क्योंकि परस्पर में विरोध आता है [अवाच्यतैकांते अपि अवाच्यं इति उक्ति: न युज्यते] और इन दोनों का अवाच्य एकांत माना जावे, तो 'तत्त्व अवाच्य है' यह कथन भी युक्त नहीं है।

  ज्ञानमती 

ज्ञानमती :


नित्य अनित्य उभय धर्मों का, मेल सदैव विरोधी है;;स्याद्वाद नय के विद्वेषी चूँकि सदा निरपेक्ष कहें;;इन दोनों का ‘अवक्तव्य’ भी, यदि एकांत विधी से है;;तब तो अवक्तव्य यह कहना, सचमुच स्ववचन बाधित है
स्याद्वादनीति से द्वेष रखने वालों के यहाँ नित्यत्व, अनित्यत्व रूप उभयैकांत मानना भी सिद्ध नहीं है क्योंकि निरपेक्ष उभयैकांत में परस्पर में विरोध है तथा यदि तत्त्व को सर्वथा अवाच्यरूप ही स्वीकार करें तो भी ‘‘तत्त्व अवाच्य है’’ यह कथन भी युक्त नहीं हो सकता है।