
ज्ञानमती :
नित्य अनित्य उभय धर्मों का, मेल सदैव विरोधी है;;स्याद्वाद नय के विद्वेषी चूँकि सदा निरपेक्ष कहें;;इन दोनों का ‘अवक्तव्य’ भी, यदि एकांत विधी से है;;तब तो अवक्तव्य यह कहना, सचमुच स्ववचन बाधित है
स्याद्वादनीति से द्वेष रखने वालों के यहाँ नित्यत्व, अनित्यत्व रूप उभयैकांत मानना भी सिद्ध नहीं है क्योंकि निरपेक्ष उभयैकांत में परस्पर में विरोध है तथा यदि तत्त्व को सर्वथा अवाच्यरूप ही स्वीकार करें तो भी ‘‘तत्त्व अवाच्य है’’ यह कथन भी युक्त नहीं हो सकता है।
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