+ नित्य और क्षणिक स्याद्वाद में निर्दोष हैं -
नित्यं तत्प्रत्यभिज्ञानान्नाकस्मात्तदविच्छिदा
क्षणिकं कालभेदात्ते बुद्ध्यसंचरदोषत:॥56॥
अन्वयार्थ : [ते तत् नित्यं प्रत्यभिज्ञानात् अकस्मात् न तत् अविच्छिदा] हे भगवन्! आपके मत में वह वस्तु नित्य है क्योंकि उसका प्रत्यभिज्ञान पाया जाता है और यह प्रत्यभिज्ञान आकस्मिक नहीं है क्योंकि वह अविच्छिन्न रूप से अनुभव में आता है [क्षणिकं कालभेदात् बुद्ध्यसंचरदोषत:] वही वस्तु क्षणिक भी है क्योंकि काल के भेद से परिणमन पाया जाता है। यदि ऐसा न मानें, तो ज्ञान का संचार नहीं होना यह दोष आ जावेगा।

  ज्ञानमती 

ज्ञानमती :


वस्तु सभी हैं नित्य कथंचित् चूँकि उनका प्रत्यभिज्ञान;;नहिं होता यह अकस्मात् अविच्छिन्नरूप से अनुभवज्ञान;;वस्तु कथंचित् अनित्य भी है, चूँकि काल से भेद दिखें;;भगवन्! यदि सर्वथा कहें तब ज्ञान असंचर दोष दिखे
हे भगवन्! आपके यहाँ सभी वस्तु कथंचित् नित्य हैं क्योंकि प्रत्यभिज्ञान से जानी जाती है। यह प्रत्यभिज्ञान आकस्मिक-निर्विषयक भी नहीं है। क्योंकि उसका अविच्छेद रूप से अनुभव होता है तथा वे ही जीवादि वस्तुएँ काल भेद की अपेक्षा से कथंचित् क्षणिक भी हैं अन्यथा बुद्धि का वहाँ संचरण नहीं हो सकता है।

भावार्थ-सभी वस्तुएँ कथंचित् नित्य हैं क्योंकि ‘यह वही है’ ऐसा जोड़ रूप ज्ञान होता है। यह ज्ञान अकस्मात् तो हो नहीं सकता है प्रत्युत अविच्छिन्न परम्परा से अनुभव में आ रहा है। दस वर्ष पहले किसी को देखा है यदि वह सामने आ गया, तब दस वर्ष पहले की याद होकर ‘यह वही है’ ज्ञान देखा जाता है। यदि ज्ञान एक आत्मा के अन्वयरूप से विच्छेद रहित न हो, तो ऐसा कैसे होगा ? उसी प्रकार वे ही सभी वस्तुएँ कथंचित् अनित्य हैं क्योंकि काल के निमित्त से परिणमन हो रहा है। एक ही पर्याय में बचपन का नाश, जवानी का उत्पाद अथवा देवपर्याय का नाश, मनुष्य पर्याय का उत्पाद आदि देखा जाता है।

यदि सभी वस्तुओं को कथंचित् नित्य और अनित्य न मानों तो ज्ञान में जो संचरण-परिणमन दिखता है, वह नहीं होना चाहिए।