
ज्ञानमती :
भगवन्! तव मत में द्रव्यार्थिक नय से वस्तू नहिं उपजे;;नहिं विनशे भी कोई वस्तू, क्योंकि अन्वय प्रगट रहे;;वही वस्तु पर्यायदृष्टि से, विनशे उपजे क्षण-क्षण में;;एक वस्तु में युगपत् व्यय, उत्पाद घ्रौव्य होना सत् है
हे भगवन्! आपके अनेकांत शासन में सभी जीवादि वस्तु सामान्य रूप से न तो उत्पन्न होती हैं, न विनष्ट होती हैं। क्योंकि उनमें सामान्य रूप अन्वय स्पष्टतया देखा जाता है। किन्तु विशेष की अपेक्षा से वही उत्पन्न होती और विनष्ट होती है एवं युगपत् एक वस्तु में उत्पादादि तीनों ही पाये जाते हैं, क्योंकि ‘सत्’ उत्पादादि त्रयात्मक ही है।भावार्थ-‘‘उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत्’’ इस प्रकार से सत् का लक्षण माना गया है और वही सत् द्रव्य का लक्षण है ‘‘सद्द्रव्यलक्षणं’’ इस सूत्र से स्पष्ट है। द्रव्य का यह लक्षण प्रत्येक द्रव्य में प्रतिसमय पाया जाता है। |