+ उत्पाद आदि अभिन्न हैं -
कार्योत्पाद: क्षयो हेतोर्नियमाल्लक्षणात्पृथक्
न तौ जात्याद्यवस्थाना-दनपेक्षा: खपुष्पवत्॥58॥
अन्वयार्थ : [हेतो: क्षय: नियमात् कार्योत्पाद: लक्षणात् पृथक्] जो उपादान कारणभूत हेतु का नाश है, वही नियम से कार्य का उत्पाद है एवं लक्षण से दोनों में भिन्नता है [न तौ जात्याद्यवस्थानात् अनपेक्षा: खपुष्पवत्] किन्तु जाति अवस्थान के कारण उत्पाद, व्यय भिन्न नहीं है। परस्पर की अपेक्षा से रहित उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य आकाश पुष्प के समान असत् ही हैं।

  ज्ञानमती 

ज्ञानमती :


उपादान कारण का जो क्षय, वही कार्य का है उत्पाद;;एक हेतु है दोनों में, फिर भी लक्षण से भिन्न विभाग;;जाती आदि अवस्थित कारण, से दोनों में भेद नहीं;;उत्पादादि यदी अनपेक्षित, गगनपुष्पवत् असत् सही
कार्य का उत्पाद ही एक हेतु नियम से अपने मृत्पिंड रूप उपादान कारण का विनाश है। उत्पाद और विनाश ये दोनों अपने-अपने लक्षण से भिन्न-भिन्न हैं तथा जाति सामान्य आदि के अवस्थान से ये दोनों भिन्न नहीं है। परस्पर में अनपेक्ष उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य ये तीनों ही खपुष्प के समान हैं।

भावार्थ-मृत्पिंड रूप उपादान कारण का नाश होकर ही घटरूप कार्यउत्पन्न होता है, ऐसा नियम देखा जाता है। यदि उत्पाद व्यय सर्वथा भिन्न ही हों, तो व्यवस्था नहीं बन सकती है। हाँ! दोनों का लक्षण भिन्न-भिन्न अवश्य है। उपादान कारण का पूर्व के आकार से नष्ट हो जाना व्यय है, उत्तराकार से प्रगट हो जाना उत्पाद है एवं दोनों अवस्थाओं में वस्तु का अस्तित्व विद्यमान रहना ध्रौव्य है। ये कथंचित् सापेक्ष होकर ही रहते हैं।