+ एक द्रव्य के नाश आदि में भिन्न भाव होते है -
घट-मौलिसुवर्णार्थी, नाशोत्पादस्थितिष्वयम्
शोक-प्रमोद-माध्यस्थ्यं, जनो याति सहेतुकम् ॥59॥
अन्वयार्थ : [अयं जन: घटमौलिसुवर्णार्थी] जो मनुष्य घट, मुकुट या स्वर्ण के इच्छुक हैं वे क्रम से [नाशोत्पादस्थितिषु सहेतुकम् शोकप्रमोदमाध्यस्थ्यं याति] घट के नाश में सकारणक शोक को, मुकुट के उत्पाद में प्रमोद को एवं दोनों अवस्थाओं में सुवर्ण के रहने से सुवर्ण इच्छुक माध्यस्थ भाव को प्राप्त होते हैं।

  ज्ञानमती 

ज्ञानमती :


घट का इच्छुक घड़ा नाश से, करता शोक सहेतुक है;;मुकुट अर्थि तो मुकुटोत्पाद से, हर्षित हुआ सहेतुक है;;स्वर्णार्थी इन उभय अवस्था, में मध्यस्थ स्वभाव धरे;;व्यय-उत्पाद-ध्रौव्य के ये, दृष्टांत सहेतुक कहे खरे
घट, मौलि एवं सुवर्ण के इच्छुक ये तीन व्यक्ति नाश, उत्पाद एवं स्थिति में सहेतुक ही शोक, प्रमोद एवं माध्यस्थ भाव को प्राप्त होते हैं।

भावार्थ-यदि कोई सुवर्ण के घट को तुड़वाकर उससे मुकुट बनवा रहा है, तो घट का इच्छुक जन शोक को प्राप्त हो जाता है और उसका शोक सकारणक होता है। जो मुकुट चाहता था, वह मनुष्य मुकुट पाकर प्रसन्न हो जाता है एवं यदि कोई सुवर्ण मात्र का इच्छुक था, तो वह दोनों ही अवस्थाओं में शोक-हर्ष न करके मध्यस्थ भाव से उसे ले लेता है। नाश, उत्पाद और ध्रौव्य इन तीनों ही अवस्थाओं में मनुष्य की प्रवृत्ति विषाद आदिरूप हो रही है, वह सहेतुक है, अहेतुक नहीं है।