+ परमाणु की अन्यरूप परिणति न मानने में दोष -
अनन्यतैकान्तेऽणूनां संघातेऽपि विभागवत्।
असंहतत्वं स्याद्भूतचतुष्कं भ्रान्तिरेव सा ॥67॥
अन्वयार्थ : [अणूनां अनन्यतैकांते विभागवत् संघाते अपि असंहतत्त्वं स्यात्] यदि परमाणुओं को एकांत रूप से अनन्य-एकरूप ही माना जावे अर्थात् परमाणुओं का कभी भी भिन्न-भिन्नरूप परिणमन न माना जाये, तब तो परमाणुओं का संघात होने पर भी स्कन्धरूप होना नहीं बन सकेगा जैसे कि परमाणुओं के विभाग में स्कन्ध होना नहीं बनता है [सा भूतचतुष्कभ्रांति: एव] पुन: जो भूत चतुष्क हैं वे भ्रांति रूप ही रहेंगे।

  ज्ञानमती 

ज्ञानमती :


यदि परमाणु सदा नित्य हैं, अन्य रूप परिणमें नहीं;;तब स्कंध रूप में भी वे, भिन्न-भिन्न ही रहें सही;;पुन: भूमि-जल-वायु अग्नि, इन भूतचतुष्टय का स्कंध;;भ्रांतरूप ही हो जावेगा, क्योंकि अणू सब पृथक्-पृथक्
परमाणुओं में अभिन्न रूप एकांत पक्ष के मानने पर उनकी संघात-स्कंध अवस्था में भी विभाग-विभक्त पदार्थों की तरह उनको पृथक्पृथक् परस्पर असंबंधित ही मानना पड़ेगा, पुन: ऐसी स्थिति में आपके द्वारा स्वीकृत भूतचतुष्क भ्रांतिरूप ही हो जायेगा, अर्थात् पार्थिव जलीय, तैजस एव वायवीय परमाणुओं के संघातरूप पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, भूतचतुष्क हैं। ये भ्रांत हो जायेंगे।