+ कार्य भ्रांत है तो कारण भी भ्रांत है -
कार्यभ्रान्तेरणु-भ्रान्ति: कार्यलिंगं हि कारणम्।
उभयाऽभावतस्तत्स्थं, गुणजातीतरच्च न ॥68॥
अन्वयार्थ : [कार्य भ्रांते: अणुभ्रांति: कारणं कार्यलिंगं हि] यदि स्कंधरूप भूतचतुष्टय को भ्रांत कहोगे, तो उसके कारणभूत परमाणु भी भ्रांत ही मानें जावेंगे, क्योंकि कारण कार्य हेतुक ही होता है [उभयभावत: तत्स्थं गुणजातीरत् च न] पुन: कार्यकारण दोनों ही भ्रांत होने से दोनों का अभाव हो जावेगा और तब उनमें रहने वाले गुण जाति क्रियादि भी नहीं बन सकेंगे।

  ज्ञानमती 

ज्ञानमती :


यदि कार्य स्कंध भ्रांत हैं, तब कारण परमाणू भ्रांत;;चूँकि कार्य हेतू से होता, कारण परमाणू का ज्ञान;;यदि दोनों ये भ्रांत हुए तब, दोनों का हो गया अभाव;;उनमें रहने वाले गुण जात्यादिक का फिर नहिं सद्भाव
कार्यभूत चतुष्क को भ्रांत मानने से परमाणुओं को भी भ्रांत मानना पड़ेगा। क्योंकि कार्य के हेतु से ही कारण का ज्ञान होता है एवं इन दोनों के अभाव से इनमें स्थित रहने वाले गुण, जाति और क्रिया आदि कुछ भी सिद्ध नहीं हो सकेंगे।