+ सांख्य के यहाँ कार्यकारणादि में एकत्व ही है -
एकत्वेऽन्यतराभाव:, शेषाऽभावोऽविनाभुव:।
द्वित्वसंख्याविरोधश्च, संवृत्तिश्चेन्मृषैव सा ॥69॥
अन्वयार्थ : [एकत्वे अन्यतराभाव: शेषाभावो अविनाभुव:] यदि सांख्य मतानुसार कार्य-कारण आदि में सर्वथा एकत्व ही माना जाये तो एक की मान्यता में दो में से किसी एक का अभाव ही ठहरेगा पुन: जो एक बचा है उसका भी अभाव हो जावेगा, क्योंकि वह पहले के साथ अविनाभावी था (द्वित्वसंख्याविरोधश्च संवृति: चेत् सा मृषा एव) पुन: द्वित्व आदि संख्या का भी विरोध हो जावेगा। यदि कहो कि द्वित्व आदि संख्याएँ संवृति रूप हैं तब तो यह संवृति तो असत्य ही है।

  ज्ञानमती 

ज्ञानमती :


कार्य और कारण में यदि, एकत्व कहो तब एक रहे;;चूँकी दोनों अविनाभावी, अत: शेष भी नहीं रहे;;द्वित्व कथन भी विरुद्ध होता, यदि संवृत्ति से मानोगे;;संवृत्ति तो यह मृषा कहाती, अत: सभी मिथ्या होंगे
आप सांख्य आदि सर्वथा कार्य-कारण में एकत्व स्वीकार करेंगे तब तो दोनों में से किसी एक का अभाव हो जायेगा। पुन: एक किसी का अभाव होने पर शेष दूसरे बचे हुए का भी अभाव हो जायेगा; क्योंकि उन दोनों में अविनाभाव नियम है तथा च ‘यह कार्य है और यह कारण है’ इस तरह की दो की संख्या में भी विरोध हो जायेगा। यदि आप कहें कि संवृत्ति से ये सब कार्य-कारण, द्वित्व संख्यादि हैं तब तो वह आपकी संवृत्ति तो सर्वथा असत्य ही है।