+ सर्वथा भिन्न-अभिन्न की उभय और अवाच्य भी सदोष है -
विरोधान्नोभयैकात्म्यं स्याद्वादन्यायविद्विषाम्।
अवाच्यतैकान्तेऽप्युक्तिर्नावाच्यमिति युज्यते ॥70॥
अन्वयार्थ : [स्याद्वादन्यायविद्विषां उभयैकात्म्यं न विरोधात्] स्याद्वाद न्याय के विद्वेषी लोगों के यहाँ कार्य-कारण आदि की भिन्नता और अभिन्नता इन दोनों का एकात्म्य माना जाये, तो भी नहीं बनता है क्योंकि इन भिन्न-अभिन्न का परस्पर में विरोध है [अवाच्यतैकांते अपि अवाच्यं इति उक्ति: न युज्यते] यदि सर्वथा दोनों को अवाच्यरूप स्वीकार किया जावे, तो कार्य-कारण का भेद-अभेद अवाच्य है, यह कथन भी नहीं बन सकेगा।

  ज्ञानमती 

ज्ञानमती :


यदी कार्य कारण में भेदा-भेद उभय का ऐक्य कहो;;स्याद्वादमत द्वेषी के यह, कैसे होगा सत्य अहो;;यदी कार्य-कारण का भेदा-भेद अवाच्य कहे कोई;;तब ‘अवाच्य’ यह कथन असंगत, स्याद्वाद बिन घटे नहीं
स्याद्वाद नीति के शत्रुओं के यहाँ अन्यता और अनन्यतारूप उभयैकात्म्य संभव नहीं है, क्योंकि वे दोनों परस्पर विरोधी हैं। यदि कोई कहे कि हम तत्त्व को अन्यत्व, अनन्यत्व से रहित ‘‘अवाच्यरूप’’ मानते हैं, तब तो तत्त्व अवाच्य है। इस प्रकार से वाक्य द्वारा कथन भी नहीं कहा जा सकता है।