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संज्ञासंख्या-विशेषाच्च, स्वलक्षणविशेषत:।
प्रयोजनादिभेदाच्च, तन्नानात्वं न सर्वथा ॥72॥
अन्वयार्थ : [द्रव्यपर्याययो: ऐक्यं तयो: अव्यतिरेकत:] द्रव्य और पर्यायों में कथंचित् अभिन्नता है क्योंकि उन दोनों को पृथक् नहीं कर सकते हैं [तन्नात्वं परिणामविशेषात् च शक्तिमत् शक्तिभावत:] कथंचित् द्रव्य और पर्यायों में भिन्नता भी है क्योंकि उनमें परिणमन भेद पाया जाता है और शक्तिमान् एवं शक्तिभाव से भी भेद है। [संज्ञासंख्याविशेषात् च स्वलक्षणविशेषत: प्रयोजनादिभेदात् च] द्रव्य पर्याय में कथंचित् नाम, संख्या आदि भेद से भी भेद हैं। अपने-अपने लक्षण भेद से भी भेद है एवं प्रयोजन, काल, प्रतिभास आदि से भी भेद है [सर्वथा न] किन्तु द्रव्य पर्यायों में सर्वथा भेद नहीं है।

  ज्ञानमती 

ज्ञानमती :


नाम भेद से संख्या से भी, द्रव्य और पर्याय पृथक्;;निज-निज लक्षण भेद उभय में, इसीलिए हैं पृथक्-पृथक्;; दोनों का है भिन्न प्रयोजन, अरु प्रतिभास भेद भी है;;इसी अपेक्षा द्रव्य और, पर्याय कथंचित् भिन्न रहें
द्रव्य और पर्याय में एकत्व हैं, क्योंकि वे दोनों सर्वथा भिन्न नहीं है तथा परिणाम विशेष से शक्तिमान, शक्तिभाव से, संज्ञा, संख्या की विशेषता से, अपने-अपने लक्षणों की भिन्नता से एवं प्रयोजनादि के भेद से वे दोनों नाना-भिन्न-भिन्न भी हैं, किन्तु सर्वथा भिन्न-भिन्न नहीं हैं।