+ धर्म, धर्मी सर्वथा आपेक्षिक या अनापेक्षिक ही नहीं है -
यद्यापेक्षिकसिद्धि: स्यान्न द्वयं व्यवतिष्ठते।
अनापेक्षिकसिद्धौ च, न सामान्यविशेषता ॥73॥
अन्वयार्थ : [यदि आपेक्षिकसिद्धि: स्यात् न द्वयं व्यवतिष्ठते] यदि सर्वथा धर्म-धर्मी की परस्पर में अपेक्षाकृत ही सिद्धि मानी जावे, तो दोनों ही सिद्ध नहीं हो सकेंगे [अनापेक्षिकसिद्धौ च सामान्यविशेषता न] यदि सर्वथा धर्म-धर्मी में एक-दूसरे की अपेक्षा न करके ही सिद्धि मानी जावे, तो भी सामान्य और विशेष भाव नहीं बन सकेंगे।

  ज्ञानमती 

ज्ञानमती :


धर्म और धर्मी आपस में, यदि आपेक्षिक सिद्ध कहें;;एक दूसरे के अभाव से, दोनों ही तब नष्ट हुए;;यदी परस्पर अनपेक्षा से, दोनों सिद्ध कहे जाते;;तब सामान्य विशेष उभय भी, एक बिना नहिं रह सकते
यदि धर्म और धर्मी की सिद्धि सर्वथा अपेक्षाकृत ही मानी जावें, तब तो इन दोनों की व्यवस्था ही नहीं बन सकेगी क्योंकि एक के द्वारा एक का विघात हो जावेगा। यदि दोनों की सिद्धि सर्वथा अनापेक्षिक ही माने जावे, तब तो इस स्थिति में सामान्य और विशेष भाव सिद्ध नहीं हो सकेंगे।