
ज्ञानमती :
धर्म और धर्मी आपस में, यदि आपेक्षिक सिद्ध कहें;;एक दूसरे के अभाव से, दोनों ही तब नष्ट हुए;;यदी परस्पर अनपेक्षा से, दोनों सिद्ध कहे जाते;;तब सामान्य विशेष उभय भी, एक बिना नहिं रह सकते
यदि धर्म और धर्मी की सिद्धि सर्वथा अपेक्षाकृत ही मानी जावें, तब तो इन दोनों की व्यवस्था ही नहीं बन सकेगी क्योंकि एक के द्वारा एक का विघात हो जावेगा। यदि दोनों की सिद्धि सर्वथा अनापेक्षिक ही माने जावे, तब तो इस स्थिति में सामान्य और विशेष भाव सिद्ध नहीं हो सकेंगे।
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