+ आपेक्षिक-अनापेक्षिक का उभय एवं अवाच्य एकांत से नहीं घटता -
विरोधान्नोभयैकात्म्यं, स्याद्वादन्यायविद्विषाम्।
अवाच्यतैकान्तेऽप्युक्तिर्नावाच्यमिति युज्यते ॥74॥
अन्वयार्थ : [स्याद्वादन्यायविद्विषां उभयैकात्म्यं न विरोधात्] स्याद्वाद न्याय के बैरियों के आपेक्षिक-अनापेक्षिक इन दोनों का एकात्म्य भी नहीं बन सकता है क्योंकि दोनों में परस्पर में विरोध है [अवाच्यतैकांते अपि अवाच्यं इति उक्ति: न युज्यते] और यदि इन दोनों का अवाच्य एकांत ही स्वीकार किया जावे, तो भी नहीं बन सकता है क्योंकि ‘अवाच्य’ है यह कथन भी शक्य नहीं हो सकेगा।

  ज्ञानमती 

ज्ञानमती :


यदि आपेक्षिक सिद्धि अनापेक्षिक सिद्धी का ऐक्य कहें;;स्याद्वाद बिन नहीं घटेगा, चूँकि परस्पर विरुद्ध हैं;;इन दोनों का ‘अवक्तव्य’, एकांतरूप से यदि मानों;;तब तो ‘अवक्तव्य’ यह कहना, स्ववचन बाधित ही जानो
स्याद्वाद न्याय के विद्वेषियों के यहाँ एकांत से आपेक्षिक और अनापेक्षिक रूप उभयैकात्म्य भी सिद्ध नहीं होता है। क्योंकि परस्पर में विरोध आता है। एकांत से अवाच्यता को ही मानने पर तो ‘‘अवाच्य’’ इस प्रकार से कथन भी नहीं बन सकता है।