+ आपेक्षिक-अनापेक्षिक की अनेकांत व्यवस्था -
धर्मधम्र्यविनाभाव: सिद्धयत्यन्योऽन्यवीक्षया।
न स्वरूपं स्वतो ह्येतत्, कारकज्ञापकाङ्गवत् ॥75॥
अन्वयार्थ : [धर्म-धम्र्यविनाभाव: अन्योन्यवीक्षया सिद्ध्यति] धर्म और धर्मी में अविनाभाव है वह परस्पर में एक-दूसरे की अपेक्षा से ही सिद्ध होता है [न स्वरूपं, स्वतो हि एतत् कारकज्ञापकाङ्गवत्] किन्तु इन धर्म-धर्मी का स्वरूप परस्पर में एक-दूसरे की अपेक्षा कृत् नहीं है वह स्वरूप तो स्वत: ही सिद्ध है जैसे कि कारक के कत्र्ता-कर्म आदि अवयव एवं ज्ञापक के बोध्य-बोधक आदि अवयव स्वत: सिद्ध हैं।

  ज्ञानमती 

ज्ञानमती :


धर्म और धर्मी का अविनाभावरूप संबंध सदा;;आपस में सापेक्ष कथंचित्, आपेक्षिक है कहलाता;; किन्तु धर्म-धर्मी दोनों का, निज स्वरूप है स्वत: प्रसिद्ध;; कारक-ज्ञापक अवयव सदृश, नहिं स्वभाव है आपेक्षिक
धर्म और धर्मी का अविनाभाव ही परस्पर की अपेक्षा से सिद्ध होता है। किन्तु वह इनका स्वरूप नहीं है। क्योंकि कारक और ज्ञापक के अंगों के समान यह स्वरूप तो स्वत: ही सिद्ध है