
ज्ञानमती :
धर्म और धर्मी का अविनाभावरूप संबंध सदा;;आपस में सापेक्ष कथंचित्, आपेक्षिक है कहलाता;; किन्तु धर्म-धर्मी दोनों का, निज स्वरूप है स्वत: प्रसिद्ध;; कारक-ज्ञापक अवयव सदृश, नहिं स्वभाव है आपेक्षिक
धर्म और धर्मी का अविनाभाव ही परस्पर की अपेक्षा से सिद्ध होता है। किन्तु वह इनका स्वरूप नहीं है। क्योंकि कारक और ज्ञापक के अंगों के समान यह स्वरूप तो स्वत: ही सिद्ध है
|