+ हेतु के और आगम के उभय एवं अवाच्य भी सदोष हैं -
विरोधान्नोभयैकात्म्यं, स्याद्वादन्यायविद्विषाम्
अवाच्यतैकान्तेऽप्युक्तिर्नावाच्यमिति युज्यते ॥77॥
अन्वयार्थ : [स्याद्वादन्यायविद्विषां उभयैकात्म्यं न] स्याद्वाद न्याय के विद्वेषियों के यहाँ हेतु और आगम के उभय का एकात्म्य भी नहीं हो सकता है [अवाच्यतैकांते अपि अवाच्यं इति उक्ति: न युज्यते] यदि इन उभय तत्त्व को सर्वथा अवाच्य कहा जाये, तो ‘अवाच्य’ यह कथन भी नहीं किया जा सकता है।

  ज्ञानमती 

ज्ञानमती :


हेतू-आगम दोनों का, एकात्म्य बने नहिं परमत में;;स्याद्वाद विद्वेषी जन के, दिखे विरोध परस्पर में;;यदि दोनों का ‘अवक्तव्य’ है, यह एकांत लिया जावे;;तब तो ‘अवक्तव्य’ पर से भी, क्यों वक्तव्य किया जावे
स्याद्वादन्याय के द्वेषी जनों के यहाँ हेतुवाद और आगमवादरूप उभयैकात्म्य भी नहीं बन सकता है क्योंकि परस्पर में विरोध आता है तथा इन दोनों के अवक्तव्यैकांत को स्वीकार करने पर तो ‘अवाच्य’ इस प्रकार का शब्द प्रयोग भी नहीं किया जा सकता है।