
ज्ञानमती :
स्वसंविदित जो ज्ञान तत्व है, अन्तरंग यदि अर्थ वही;;तब बुद्धि-अनुमान-शास्त्र सब, बाह्य वस्तु हैं मृषा सही;;अत: प्रमाणाभास हुये ये, अनुमान आगम चूंकि मृषा;;बिन प्रमाण के कहाँ प्रमाणाभास बनेगा सभी सफा
यदि अंतरंग-ज्ञानरूप पदार्थ को ही वास्तविक मानकर उसका एकांत स्वीकार किया जावे, तब तो सभी बुद्धि-अनुमान और वाक्य-आगम मिथ्या ही हो जावेगा। अत: वे बुद्धि और वाक्य प्रमाणाभास ही सिद्ध होंगे। पुन: वह प्रमाणाभास भी प्रमाण के बिना कैसे सिद्ध हो सकेगा ?
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