+ ज्ञान मात्र मानने से साध्य-साधन भी नहीं बनेंगे -
साध्यसाधनविज्ञप्तेर्यदि विज्ञप्तिमात्रता
न साध्यं न च हेतुश्च, प्रतिज्ञाहेतुदोषत: ॥80॥
अन्वयार्थ : [यदि साध्यसाधनविज्ञप्ते: विज्ञप्तिमात्रता] यदि साध्य और साधन के ज्ञान को ज्ञानमात्र ही माना जाये, तब तो [न साध्यं न च हेतु: च प्रतिज्ञाहेतुदोषत:] साध्य और हेतु ये दोनों नहीं बनते हैं एवं द्वितीय चकार से दृष्टांत भी नहीं बनता है, क्योंकि ऐसा कहने में प्रतिज्ञा दोष और हेतु दोष उपस्थित होता है।

  ज्ञानमती 

ज्ञानमती :


साध्य हेतु का ज्ञान यदी, बस ज्ञान मात्र माना जावे;;तब तो साध्य नहीं होगा, हेतू दृष्टांत नहीं होंगे;;चूँकि ‘प्रतिज्ञादोष’ कहा जो, स्ववचन बाधित आवेगा;;‘हेतुदोष’ है असिद्धादि ये, आते सब दूषित होगा
साध्य और साधन की विज्ञप्ति को यदि विज्ञान मात्र ही स्वीकार किया जावे, तब तो प्रतिज्ञा और हेतु के दोष से न साध्य ही सिद्ध होगा न हेतु एवं दृष्टांत ही बन सकेंगे।

भावार्थ-प्रतिज्ञा दोष अर्थात् स्ववचन विरोध होता है और हेतु दोष अर्थात् असिद्ध, विरुद्ध, अनैकांतिक दोष आते हैं। साध्य सहित पक्ष के कहने को ‘प्रतिज्ञा’ एवं साधन के वचन को हेतु कहते हैं। विज्ञानाद्वैतवादी बौद्ध सभी तत्त्वों को ज्ञान मात्र ही कहता है तब साध्य और साधन व्यवस्था कैसे बनेगी ?