
ज्ञानमती :
बाह्य अर्थ को ही यदि मानों, चेतन का बस नाश हुआ;;तभी प्रमाणाभास विपर्यय, संशय आदि समाप्त हुआ;;पुन: विरोधी कथनी वाले, सबके सभी विरोधी मत;;सच्चे हो जावेंगे फिर तो, नहीं रहें मिथ्यात्वी जन
घट-पटादि बाह्य पदार्थ ही एकांत से हैं अंतरंग पदार्थ नहीं हैं, ऐसी एकांत मान्यता में तो संशयादि रूप प्रमाणाभास का निन्हव हो जाने से सभीविरुद्धार्थ को कहने वालों की भी कार्यसिद्धि हो जावेगी, क्योंकि बाह्य पदार्थसभी सत्यरूप ही हैं।
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