+ सर्वथा बहिरंग अर्थ ही है ऐसा कहना भी सदोष है -
बहिरङ्गार्थतैकान्ते प्रमाणाभासनिन्हवात्
सर्वेषां कार्यसिद्धि:स्याद्विरुद्धार्थाऽभिधायिनाम् ॥81॥
अन्वयार्थ : [बहिरङ्गार्थतैकांते प्रमाणाभासनिन्हवात्] यदि एकांत से बाह्य पदार्थ ही माने जावें, अंतरंग ज्ञान तत्त्व न माना जावे, तब तो इससे प्रमाणाभास का लोप हो जावेगा [विरुद्धार्थाभिधायिनां सर्वेषां कार्यसिद्धि: स्यात्] तब तो विरुद्ध अर्थ को कहने वाले सभी जनों के सभी कार्य सिद्ध हो जावेंगे।

  ज्ञानमती 

ज्ञानमती :


बाह्य अर्थ को ही यदि मानों, चेतन का बस नाश हुआ;;तभी प्रमाणाभास विपर्यय, संशय आदि समाप्त हुआ;;पुन: विरोधी कथनी वाले, सबके सभी विरोधी मत;;सच्चे हो जावेंगे फिर तो, नहीं रहें मिथ्यात्वी जन
घट-पटादि बाह्य पदार्थ ही एकांत से हैं अंतरंग पदार्थ नहीं हैं, ऐसी एकांत मान्यता में तो संशयादि रूप प्रमाणाभास का निन्हव हो जाने से सभीविरुद्धार्थ को कहने वालों की भी कार्यसिद्धि हो जावेगी, क्योंकि बाह्य पदार्थसभी सत्यरूप ही हैं।