+ अंतरंग और बहिरंग अर्थ का उभय और अवाच्य भी सदोष हैं -
विरोधान्नोभयैकात्म्यं स्याद्वादन्यायविद्विषाम्
अवाच्यतैकान्तेऽप्युक्तिर्नावाच्यमिति युज्यते ॥82॥
अन्वयार्थ : [स्याद्वादन्यायविद्विषां उभयैकात्म्यं न विरोधात्] स्याद्वाद न्याय के विद्वेषियों के यहाँ ज्ञान तत्त्व और बाह्य तत्त्व इन उभय का एकात्म्य भी नहीं हो सकता है क्योंकि इनका परस्पर में विरोध है [अवाच्यतैकांते अपि अवाच्यं इति उक्ति: न युज्यते] यदि इन दोनों का सर्वथा अवाच्य स्वीकार किया जावे, तब तो ‘अवाच्य’ यह कथन भी नहीं हो सकेगा।

  ज्ञानमती 

ज्ञानमती :


अंतरंग बहिरंग ज्ञेय का, जो ऐकांतिक ‘ऐक्य’ कहा;;स्याद्वाद विद्वेषी जन के, मत में सदा विरोध रहा;;ज्ञान और बाह्यार्थ वस्तु को, यदी अवाच्य कहा जिसने;;तब तो वचनों से ‘अवाच्य’ को, कैसे वाच्य किया उसने
स्याद्वादन्याय के विद्वेषियों के यहाँ एकान्त से इन दोनों का उभयैकात्म्य भी संभव नहीं है, क्योंकि परस्पर में विरोध आता है एवं तत्व को अवाच्य रूप स्वीकार करने पर तो ‘‘अवाच्य’’ यह शब्द भी नहीं कहा जा सकता है।