+ ज्ञान पदार्थ और बाह्य पदार्थ दोनों ही सिद्ध हैं -
भावप्रमेयापेक्षायां प्रमाणाभासनिन्हव:
बहि:प्रमेयापेक्षायां प्रमाणं तन्निभं च ते ॥83॥
अन्वयार्थ : [ते भावप्रमेयापेक्षायां प्रमाणाभासनिन्हव:] हे भगवन्! आपके मत में अंत: प्रमेय की अपेक्षा करने पर प्रमाणाभास का लोप हो जाता है [बहि: प्रमेयापेक्षायां प्रमाणं तन्निभं च] बाह्य पदार्थों के प्रमेय की अपेक्षा करने पर प्रमाण और प्रमाणाभास दोनों ही होते हैं।

  ज्ञानमती 

ज्ञानमती :


भाव प्रमेयापेक्षा करके, नहीं प्रमाणाभास रहे;;चूँकी ज्ञान स्व-स्वरूप, संवेदन से हि प्रमाण कहे;;बाह्य पदार्थ प्रमेयापेक्षा, कहे प्रमाण, प्रमाणाभास;;अत: नाथ! तव मत में अंत:-बाह्य तत्त्व दोनों विख्यात
हे भगवन्! आपके सिद्धान्त में भाव-ज्ञान को प्रमेयरूप से अपेक्षित करने पर प्रमाणाभास का लोप हो जाता है एवं बाह्य पदार्थ को प्रमेय रूप से अपेक्षित करने पर तो प्रमाण एवं प्रमाणाभास दोनों ही सिद्ध हो जाते हैं।

भावार्थ-स्वसंवेदन ज्ञान की अपेक्षा से सभी ज्ञान प्रमाण हैं चाहे संशय आदि ही क्यों न हों क्योंकि सभी ज्ञान अपने-अपने स्वरूप के द्योतक होने से अपने-अपने विषय में प्रमाण ही हैं। वहाँ प्रमाणाभास का नाम ही नहीं है, किन्तु जब बाह्य पदार्थों को प्रमेय करते हैं तब प्रमाण और प्रमाणाभास दोनों ही व्यवस्थाएँ बन जाती हैं। जहाँ विसंवाद होता है अथवा बाधा आती है वहाँ प्रमाणाभास बनता है, किन्तु जहाँ विसंवाद न होकर निर्बाधता रहती है वहाँ प्रमाण बनता है। इस प्रकार से प्रमाण-अप्रमाण की व्यवस्था में कोई विरोध नहीं आता है।