
ज्ञानमती :
जीव शब्द निज बाह्य अर्थ से, युक्त नित्य चैतन्य पुरुष;;चूँकि संज्ञारूप कहा है जैसे हेतू शब्द सुलभ;;माया आदि शब्द दिखते हैं, भ्रांतरूप फिर भी वे सब;;ज्ञान शब्दवत् अपना-अपना, अर्थ प्रगट करते संतत
संज्ञारूप होने से ‘हेतु’ इस शब्द की तरह जीव यह शब्द भी जीव लक्षण अपने बाह्य अर्थ से सहित हैं। जैसे प्रमाण वचन अपने अर्थ से युक्त हैं तथैव मायादि, भ्रांति शब्द अपने मायादि अर्थों से सहित हैं।
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