+ संज्ञा रूप हेतु निर्दोष है -
बुद्धिशब्दार्थसंज्ञास्तास्तिस्रो बुद्ध ्यादिवाचिका:
तुल्या बुद्ध्यादिबोधाश्च, त्रयस्तत्प्रतिबिम्बका: ॥85॥
अन्वयार्थ : [बुद्धिशब्दार्थसंज्ञा: ता: तिस्र: बुद्ध्यादिवाचका:] बुद्धि, शब्द और अर्थ ये तीनों नाम अपने से भिन्न बुद्धि, शब्द एवं अर्थ रूप अपने वाच्य अर्थ को कहते हैं [बुद्ध्यादिबोधा: च तुल्या: त्रय: तत्प्रतिबिम्बका:] तथा जो बुद्धि शब्द और अर्थरूप तीनों के ज्ञान हैं वे तुल्य हैं एवं ये तीनों ही बुद्ध्यादि विषय के प्रतिबिम्बक हैं।

  ज्ञानमती 

ज्ञानमती :


बुद्धी, शब्द, अर्थ ये तीनों, संज्ञा नाम कहे जाते;;निज से पृथक् बुद्धि अरु शब्द, अर्थ वस्तु को ये कहते;;अत: तुल्य है तथा नाम त्रय, के प्रतिबिम्बक भी तीनों;;बुद्धि शब्द अरु अर्थ ज्ञान ये, बाह्य वस्तु व्यंजक तीनों
ज्ञान, शब्द एवं अर्थ इन तीनों की संज्ञाएँ बुद्धि आदि पदार्थ को कहने वाली हैं। अत: वे तुल्य हैं तथा बुद्धि, शब्द और अर्थ रूप ज्ञान हैं वे भा तीनों बुद्धि आदि विषय के प्रतिबिम्बक हैं।

भावार्थ-उच्चरित शब्द से जो निश्चित ज्ञान होता है वही उसका निजी अर्थ है जैसे घट शब्द के उच्चारण से श्रोता को कम्बूग्रीवादि सहित घट पदार्थ का बोध होता है अत: घट शब्द का अर्थ घटरूप पदार्थ माना गया है। वैसे ही शब्द-शब्द से उसका बाह्य अर्थ स्पष्ट झलक जाता है।

जीवार्थक जीव शब्द, बुद्धि अर्थक जीव शब्द एवं नाम अर्थक जीव शब्द ये तीनों ही अपने से भिन्न अर्थ ज्ञान एवं नामरूप तीन वाच्य अर्थ को कहते हैं क्योंकि इनके प्रतिबिम्बक ज्ञान तीन ही होते हैं। इस प्रकार से एक जीव पदार्थ का ज्ञान नाम एवं अर्थ रूप से प्रतिपादन करने वाली होने से इन संज्ञाओं में समानता है एवं एक जीव को ही ज्ञान नाम एवं अर्थ रूप संज्ञाओं में दिखाने वाले होने से इनके प्रतिबिम्बक ज्ञानों में समानता है।