
ज्ञानमती :
वक्ता, श्रोता और प्रमाता, इनके ज्ञान अरु वाक्य प्रमाण;;पृथक्-पृथक् हैं यदि ज्ञानादिक, भ्रांतरूप ही कहे तमाम;;प्रमा भ्रांत होने से तो फिर, इष्ट अनिष्ट पदार्थ सभी;;तथा प्रमाण अरु अप्रमाण ये, भ्रांत रूप हो जाएं सही
वक्ता, श्रोता एवं प्रमाता के बोध वाक्य एवं प्रमा ये शब्द भिन्नभिन्न ही अवभासित होते हैं। यदि बोध, वाक्य और प्रमा को भ्रांतिरूप ही मानाजावे, तब तो प्रमाण भी भ्रांतरूप हो जायेगा, पुन: तादृशभ्रांत-अप्रमाण एवं इतरअभ्रांत-प्रमाण रूप वे इष्ट और अनिष्ट बाह्य पदार्थ भी भ्रांत ही मनाने पड़ेंगे।
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