+ ज्ञान और शब्द की प्रमाणता कैसे है ? -
बुद्धिशब्दप्रमाणत्वं, बाह्यार्थे सति नाऽसति
सत्यानृतव्यवस्थैवं, युज्यतेऽर्थाप्त्यनाप्तिषु ॥87॥
अन्वयार्थ : [बाह्यार्थे सति बुद्धि शब्दप्रमाणत्वं असति न] बाह्य पदार्थ के होने पर ही ज्ञान और शब्द में प्रमाणता आती है और बाह्य अर्थ के नहीं होने पर नहीं आती है [एवं अर्थाप्त्यनाप्तिषु सत्यानृतव्यवस्था युज्यते] इसी प्रकार सेबाह्य पदार्थ की प्राप्ति में सत्य की व्यवस्था एवं प्राप्ति न होने में असत्य की व्यवस्था बनती है।

  ज्ञानमती 

ज्ञानमती :


बाह्य पदार्थ के होने पर, ज्ञान अरु शब्द प्रमाण सही;;बाह्य पदारथ नहिं होवे यदि, ज्ञान अरु शब्द प्रमाण नहीं;;अत: अर्थ की प्राप्ती से ही, वस्तु व्यवस्था घटती है;;किन्तु अर्थ यदि प्राप्त न हो तब, मृषा व्यवस्था बनती है
बाह्य पदार्थ के होने पर बुद्धि-ज्ञान और शब्द को प्रमाणता है एवं बाह्यार्थ के नहीं होने पर उनको प्रमाणरूपता नहीं है। इस प्रकार से अर्थ की प्राप्ति और अप्राप्ति में सत्य एवं असत्य की व्यवस्था की जाती है।

भावार्थ-विज्ञानाद्वैतवादी ज्ञान को ही प्रमाण मानता है। इस पर आचार्य कहते हैं कि बाह्य पदार्थों को माने बिना ज्ञान में प्रमाणता-अप्रमाणता की व्यवस्था नहीं बन सकती है। अंतज्र्ञेय रूप ज्ञान को ही प्रमेय करने की अपेक्षा रखने पर तो सम्यग्ज्ञान एवं मिथ्याज्ञान सब में प्रमाणता होती है क्योंकि संशय, विपर्यय, अनध्यवसाय रूप मिथ्याज्ञान भी अपने-अपने स्वरूप को जैसे का तैसा कहते हैं अत: स्वरूप ज्ञान की अपेक्षा सभी ज्ञान प्रमाण ही हैं किन्तु जब ज्ञान में प्रमाणता की कसौटी करनी होती है तब उस ज्ञान के द्वारा जाने गये पदार्थों की ओर दृष्टि डालनी पड़ती है।

यदि ज्ञान का विषयभूत पदार्थ जिस रूप से ज्ञान से जाना गया है। वैसा ही दिख रहा है तब तो वह ज्ञान सत्य माना जाता है। यदि उस रूप से नहीं दिख रहा है। तब वह ज्ञान असत्य माना जाता है। इसलिए ज्ञान में प्रमाणता और अप्रमाणता बाह्यार्थ के होने पर ही आती है अन्यथा नहीं। वैसे ही शब्द में प्रमाणता और अप्रमाणता भी बाह्य अर्थ के होने पर ही आती है अन्यथा नहीं, क्योंकि स्वपक्ष साधन और परपक्ष दूषण शब्द बिना एवं बाह्य अर्थ के बिना नहीं बन सकते हैं। इसलिए बाह्य अर्थ वास्तविक हैं, ऐसा मानना चाहिए।