
ज्ञानमती :
यदी भाग्य से सभी कार्य की, सिद्धि मान लिया तबतो;;पुरुषारथ से भाग्यरूप यह, कार्य बना यह कहना क्यों;;यदी भाग्य यह पूर्व-पूर्व के, भाग्यों से ही बन जाता;;तब तो मोक्ष नहीं किसको भी, पौरुष भी निष्फल होगा
यदि दैव-भाग्य से ही अर्थ-प्रयोजन की सिद्धि मानी जाये, तब तो वह दैव पौरुष से पुरुष के व्यापार से कैसे सिद्ध होगा ? यदि ऐसा कहो कि उस दैव की सिद्धि भी दैव से ही होती है, तब तो मोक्ष भी कभी नहीं हो सकेगा अत: उस मोक्ष का अभाव हो जावेगा एवं मोक्ष के कारणरूप से स्वीकृत पौरुष-पुरुषार्थ भी निष्फल हो जावेगा।
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