
ज्ञानमती :
यदि पुरुषार्थ अकेले से ही, सभी कार्य की सिद्धि कहो;;तब तो भाग्य उदय से यह, पुरुषारथ कैसे बना अहो!;;यदि पुरुषार्थ स्वयं पौरुष से, होता तब तो सब जन के;;सभी कार्य की सिद्धी होगी, चूंकि सभी में पौरुष है
यदि केवल पुरुषार्थ से ही अर्थ की सिद्धि मानी जावे, तब तो दैव से पुरुषार्थ देखा जाता है, वह कैसे घटेगा? यदि कहो कि पुरुषार्थ भी पुरुषार्थ से ही उत्पन्न होता है पुन: किये गये सभी कार्य सफल होने चाहिए, क्योंकि पुरुषार्थ तो सभी प्राणियों में पाया जाता है।
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