+ भाग्य-पुरुषार्थ के उभय एवं अवाच्य का खंडन -
विरोधान्नोभयैकात्म्यं स्याद्वादन्यायविद्विषाम्
अवाच्यतैकान्तेऽप्युक्तिर्नावाच्यमिति युज्यते ॥90॥
अन्वयार्थ : [स्याद्वादन्यायविद्विषां उभयैकात्म्यं न विरोधात्] स्याद्वाद न्याय के विद्वेषियों के यहाँ भाग्य और पुरुषार्थ इन दोनों का एकात्म्य भी संभव नहीं है क्योंकि दोनों का परस्पर में विरोध है [अवाच्यतैकांते अपि अवाच्यं इति उक्ति: ना युज्यते] यदि अवाच्यता का एकांत माना जाता है तो ‘ये दोनों तत्त्व अवाच्य हैं’’ ऐसा कहना भी असंभव हो जाता है।

  ज्ञानमती 

ज्ञानमती :


भाग्य और पुरुषार्थ उभय का, ऐक्य नहीं है आपस में;;चूँकि विरोधी हैं ये दोनों, स्याद्वाद नय द्वेषी के;;यदि इन दोनों की ‘अवाच्यता’, कहो सर्वथा की विधि से;;तब तो वचनों से ‘अवाच्य’ इस, पद को वाच्य किया कैसे?
स्याद्वाद न्याय के बैरियों के यहाँ उभय ऐकात्म्य भी नहीं हैं अर्थात् पृथक् कार्य की अपेक्षा से दैव एवं पौरुष के एकात्म्य को मीमांसक ने माना है वह भी सिद्ध नहीं है, क्योंकि परस्पर में विरोध आता है। एकांत से अवाच्यता के मानने पर ‘अवाच्य’ यह उक्ति ही असंभव है।