+ भाग्य और पुरुषार्थ का अनेकांत -
अबुद्धिपूर्वाऽपेक्षाया-मिष्टानिष्टं स्वदैवत:
बुद्धिपूर्वव्यपेक्षायामिष्टानिष्टं स्वपौरुषात् ॥91॥
अन्वयार्थ : [अबुद्धिपूर्वापेक्षायां इष्टानिष्टं स्वदैवत:] बुद्धि व्यापार की अपेक्षा रखे बिना अनायास ही जो इष्ट-अनिष्ट कार्य सिद्ध हो जाते हैं वे अपने-अपने भाग्य से सिद्ध होते हैं। [बुद्धिपूर्वव्यपेक्षायां इष्टानिष्टं स्वपौरुषात्] एवं बुद्धिपूर्वक की अपेक्षा करके जो इष्ट-अनिष्ट कार्य सिद्ध होते हैं वे पुरुषार्थकृत हैं।

  ज्ञानमती 

ज्ञानमती :


बिना विचारे अनायास ही, इष्ट अनिष्ट कार्य कोई;;जब बन जावे तब समझो तुम, भाग्य प्रधान हमारा ही;;बुद्धीपूर्वक यदि प्रयत्न से, इष्ट अनिष्ट कार्य बनते;;तब तो निज के पुरुषार्थ को, मुख्यभाग्य को गौण कहें
अबुद्धिपूर्वक की अपेक्षा में जो इष्ट एवं अनिष्ट कार्य होते हैं वे स्वभाग्य से होते हैं एवं बुद्धिपूर्वक की अपेक्षा करने पर सभी इष्ट, अनिष्ट कार्य अपने पुरुषार्थ से होते हैं।

भावार्थ-ये भाग्य और पुरुषार्थ सदैव एक-दूसरे की अपेक्षा रखकर होते हैं भाग्य के बिना अकेला पुरुषार्थ एवं पुरुषार्थ के बिना अकेला भाग्य असंभव है। जब कोई भी कार्य बिना प्रयास के सफल होते हैं तब भाग्य की प्रधानता और पुरुषार्थ गौण है एवं जब कोई भी कार्य प्रयत्नपूर्वक सिद्ध होते हैं तब पुरुषार्थ प्रधान है भाग्य गौण है।