
ज्ञानमती :
बिना विचारे अनायास ही, इष्ट अनिष्ट कार्य कोई;;जब बन जावे तब समझो तुम, भाग्य प्रधान हमारा ही;;बुद्धीपूर्वक यदि प्रयत्न से, इष्ट अनिष्ट कार्य बनते;;तब तो निज के पुरुषार्थ को, मुख्यभाग्य को गौण कहें
अबुद्धिपूर्वक की अपेक्षा में जो इष्ट एवं अनिष्ट कार्य होते हैं वे स्वभाग्य से होते हैं एवं बुद्धिपूर्वक की अपेक्षा करने पर सभी इष्ट, अनिष्ट कार्य अपने पुरुषार्थ से होते हैं।भावार्थ-ये भाग्य और पुरुषार्थ सदैव एक-दूसरे की अपेक्षा रखकर होते हैं भाग्य के बिना अकेला पुरुषार्थ एवं पुरुषार्थ के बिना अकेला भाग्य असंभव है। जब कोई भी कार्य बिना प्रयास के सफल होते हैं तब भाग्य की प्रधानता और पुरुषार्थ गौण है एवं जब कोई भी कार्य प्रयत्नपूर्वक सिद्ध होते हैं तब पुरुषार्थ प्रधान है भाग्य गौण है। |