
ज्ञानमती :
यदि पर को दु:ख देने से ही, पाप बंध सुख से हो पुण्य;;कंटक आदि अचेतन को तब, पाप बंध हो पय१ को पुण्य;;यदि चेतन नहिं बंधते है तब, अकषायी मुनि गतरागी;;जन को सुख-दु:ख के निमित्त से, पुण्य-पाप के हों भागी
यदि दूसरे प्राणी में दु:ख उत्पन्न करने से एकांतत: पाप का बंध तथा सुख देने से पुण्य का बंध माना जायेगा, तब तो अचेतन पदार्थ एवं वीतरागी भी निमित्त से पुण्य-पाप रूप बंध को प्राप्त हो जावेंगे।
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